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Monday 21st of August 2017
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नमाज.की अज़मत

कभी मीसम कभी बूजर ने पढी हे ये नमाज.
हर एक हाल मे कंमबर ने पढी हे ये नमाज.


 तू बहाना ना बना वक़त की मजबूरी कl,
नोके नेज़ा पे भी सरवर ने पढी हे ये नमाज.

 

छोड देता हे फ़क़त आरज़ी बीमारी मे,
तोक़ मे आबिदे मुज़तर ने पढी हे ये नमाज.

 

तू नमाज़ों को कभी छोड़ ना दुनया के लिए,
भूक मे शाह के लशकर ने पढी हे ये नमाज.

 

कुछ मुसीबत हे तो फिर दिल मे बसा ले अपने
 क़ैद मे ज़ैनबे मुज़तर ने पढी हे ये नमाज.

 

अपने बच्चो को सिखा बनदगीये इशक़े ख़ुदा,
दसते शबबीर पे असगर ने पढी हे ये नमाज.

 

आज भी कान मे गूंजे हे अज़ाने अकबर,
सोच किस तरह से अकबर ने पढी हे ये नमाज.


शिमर ने हाय तमाचों पे तमाचे मारे,
फिर भी शबबीर की दुखतर ने पढी हे ये नमाज.


रोज़े मेहशर के लिए नेमते उज़मा हे नमाज,
जंग मे फातहे ख़ेबर ने पढी हे ये नमाज.


इसकी अज़मत के लिए सिफ॔ यही काफ़ी हे,
रात दिन मरज़िये दावर ने पढी हे ये नमाज.


थोडी तकलीफ़ हुई ओर तू मसजिद ना गया,
ज़रब लगने पा भी हैदर ने पढी हे ये नमाज.


तू मुसलमान हे इस बात का रखना हे ख़याल
 तमाम नबीयो पयमबर ने पढी हे ये नमाज.


ऐ फिरोज़ आख़री साँसों मे भी छूटे ना नमाज.
तहे खनजर भी तो सरवर ने पढी हे ये नमाज.


जाने कया बात थी तीरों की भी बारिश मे फिरोज.
जलती रेती पे बहततर ने पढी हे ये नमाज.

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